छठवीं शताब्दि ई0पू0 की राजनैतिक , सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति

 

छठवीं शताब्दि ई0पू0 की राजनैतिक , सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति

राजनैतिक इतिहास

उत्तर वैदिक काल तक आर्य के राज्य का आधार जन, कबीले अथवा जाति थे। जो जन या जाति जहां पर बसता था, उसके नाम पर ही उस प्रदेश या प्रांत का पड़ जाता। ऐसे राज्यों को “जन राज्य” कहा जाता था। किन्तु अब प्रदेश का नाम किसी जन अथवा वंश पर न होकर भौगोलिक हो गया तथा ये भौगोलिक प्रदेश ‘‘ जनपद ’’ कहलाने लगे। एक ही भौगोलिक पृष्ठभूमि के दो या दो से अधिक जन मिल कर जनपद में बदल गए।

छठवीं शताब्दि ई0पू0 में भारत में किसी का एक छत्र राज्य नहीं था। अनेक छोटे-छोटे राज्य जनपदों में विभक्त थे, जहां कुछ जनपदों में राजतंत्र तथा कुछ जनपदों में गणतंत्र था।

छठवीं शताब्दि ई0पू0 के आते आते प्रत्येक जनपद का विस्तार हो चुका था। सीमा विस्तार की भावना एवं पारस्परिक युद्धों से जनपद अपेक्षाकृत विस्तृत हो गए तथा ये ‘‘ महाजनपद ’’ कहलाने लगे।

महाजनपद

भारत की सालह महाजनपदों की स्पष्ट सूची बौद्ध साहित्य ‘ अंगुत्तर निकाय ’ से प्राप्त होती है। जैन साहित्य ‘ भगवती सूत्र ’ में भी इनका उल्लेख मिलता है। इन सोलह महरजनपदों का वर्णन निम्नानुसार है :-

1. अंग

अंग महाजनपद में बिहार (प्राचीन मगध राज्य का पश्चिमी क्षेत्र) में आधुनिक भागलपुर तथा मुंगेर के मध्य का भाग था। मगध तथा अंग के मध्य चम्पा नदी (वर्तमान में चांदन नदी) थी। अतः चम्पा नदी पूर्व में स्थित अंग की राजधानी का नाम चम्पा था।बुद्ध कालीन छः प्रमुख नगरों में यह नगरी अति महत्वपूर्ण थी। ‘‘ दीर्घनिकाय ’’ के अनुसार चम्पा नगर की निर्माण योजना का वास्तुकार ‘‘ महागोविन्द ’’ ने बनाई थी। ‘ विधुर पण्डित जातक ’  के अनुसार राजगृह आरम्भ में अंग का ही एक नगर था। अंग तथा मगध में निरंतर संघर्ष होता रहता था। प्रारंभ में अंग नरेष ‘‘ ब्रम्हदत्त ’’ ने मगध को परास्त किया था, परन्तु कालान्तर में अंग राज्य, मगध में समाहित हो गया।

2. काशी

काषी की राजधानी वाराणसी थी, जो वरूण तथा असि नदियों के संगम तट पर बसी थी। ‘‘ गुत्तिल जातक ’’ के अनुसार यह नगरी बारह योजन में विस्तृत थी। ‘‘ महावग्ग ’’ में काशी की शक्ति तथा समृद्धि का वर्णन प्राप्त होता है। जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ के पिता काशी के राजा थे। बुद्ध के कुछ समय पूर्व ही इस पर कौशल राज्य का अधिकार हो गया था। अजातशत्रु के समय काशी मगध राज्य के अधीन हो गया।

3. वज्जि

रीज डेविड्स के अनुसार मगध के उत्तर में स्थित वज्जि आठ कुलों का संयोग था। इनमें विदेह ( मिथिला), लिच्छवी (वैषाली) तथा ज्ञात्रिक (कुण्डग्राम) प्रमुख थे। इन सब में लिच्छिवियों का वर्चस्व था। ‘ महावस्तु ’ से ज्ञात होता है कि लिच्छिवियों के निमंत्रण पर ही बुद्ध वैशाली गए थे। गौतम बुद्ध ने लिच्छिवियों के आंतरिक संगठन को ही उनकी अजेयता का कारण बताया था। वज्जि संघ राज्य की राजधानी ‘‘ वैशाली ’’ थी। कालान्तर में मगण ने वज्जि को अजातशत्रु के शासनकाल में विजित कर लिया। कौटिल्य ने लिच्छिवियों को वज्जि से पृथक बताया है।

4. मल्ल

मल्ल राज्य भी नौ जातियों संघात्मक राज्य था। कालान्तर में यहां पर गणतंत्र स्थापित हो गया था। ‘ महाभारत ’ के अनुसार मल्ल राष्ट की दो शाखाएं थीं -

1.       कुशावती ( कुशीनारा) : आधुनिक देवरिया जिले में कसिया तथा अनुरूधवा

2.       पावा : आधुनिक पड़रौना या अनापा

बुद्ध के उपरांत इसे मगध ने विजित कर लिया।

5. चेदि

कुरू का यह पड़ौसी राज्य यमुना तट पर स्थित वर्तमान बुंदेलखण्ड के अंर्तगत था। इसकी राजधानी शुक्ल या शुक्तिमति /सोत्थमति/ थी। जातकों तथा महाभारत में वर्णित इस चेदि राज्य का ही राजा शिशुपाल था। कलिंग (उड़ीसा) का चेदि वंशज नरेश खारवेल संभवतः इसी चेदि प्रदेश की शाखा था।

6. कुरू

वर्तमान दिल्ली, मेरठ तथा थानेश्वर (द0पू0 हरियाणा) का यह प्रदेश उत्तर वैदिक साहित्य में ख्याति प्राप्त है। जातकों तथा महाभारत के अनुसार इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ (हस्तिनापुर) थी। यादवों, भोजों तथा पांचालों से इसके वैवाहिक संबंध थे। राजधानी हस्तिनापुर के गंगा के बाढ़ में बह जाने पर कुरू की एक शाखा ने वत्स प्रदेश में नवीन राजवंश की नींव डाली तथा कुरू राजवंश का नवीन स्वरूप वत्स वंश के रूप में प्रकट हुआ। संभवतः उदयन इसी वत्स वंश की संतान था।

7. पांचाल

हिमालय की तराई से चंबल नदी तक फैले इस महाजनपद के दो प्रमुख भाग थे।

1. उत्तर पांचाल - इसकी राजधानी अहिच्छत्र थी। (वर्तमान जिला बरेली का रामपुर )

2. दक्षिण पांचाल - इसकी राजधानी काम्पिल्य थी। (वर्तमान फरूख्खाबाद जिला)

दोनों भागों का विभाजन गंगा नदी के द्वारा होता था। कन्नौज का प्रसिद्ध नगर अपेक्षाकृत शक्तिशाली भाग दक्षिण पांचाल की शोभा था। ‘‘ चुलानी ब्रम्हदत्त ’’ पांचाल का शक्तिशाली राजा था। इसका विशद वर्णन महाभग्ग जातक, उत्तराध्ययन सूत्र, स्वप्नवासव दत्तम् तथा रामायण से प्राप्त होता है। जैन ग्रंथ उत्तराध्ययन सूत्र के अनुसार इस प्रदेश का राजा ‘ संजय ’(द0पांचाल) सत्ता त्याग कर जैन अनुयायी हो गया था। कौटिल्य के समय यहां पर गणतंत्र स्थापित हो गया।

8. मत्स्य (जयपुर प्रदेश)

इसकी राजधानी विराट नामक राजा के द्वारा स्थापित विराट नगरी (वैराट) थी। महाभारत में इसके राजा शहाज का वर्णन है जो चेदि तथा मत्स्य दोनों का शासक था। अतः मत्स्य पूर्व में में चेदि तत्पश्चात मगध के अधीन हो गया।

9. शूरसेन

इसकी राजधानी मथुरा थी। यहां का शासक ‘‘ अवन्तिपुत्र ’’ बुद्ध का अनुचर था। जिसके अवन्ति से पारिवारिक संबंध थे। पूर्व में यहां गणतंत्र था। इसे भी मगध ने अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। यूनानी इस राज्य को SOURASENOI कहते थे।

10. अस्सक या अष्मक

दक्षिण की गंगा ‘‘ गोदावरी ’’ के तट पर स्थित इस राज्य की राजधानी पोतन या पाटल थी। अश्मक तथा मूलक प्रदेश परस्पर पड़ौसी थे। दोनों ही इक्ष्वाकु वंशज थे। अंततः यह राज्य अवन्ति द्वारा विजित कर लिया गया।

11. गांधार

कुम्भकार जातक के अनुसार तक्षशिला इसकी राजधानी थी। इसके बुद्ध कालीन राजा पुष्करसारि ने बिम्बसार के पास अपना दूत भेजा था। तथा अवन्ति के राजा प्रद्योत को युद्ध में परास्त किया था।

12. काम्बोज

इस महाजनपद की राजधानी हाटक थी। पुज के दक्षिण में स्थित रामपुरा इनका मूल स्थान था। कौटिल्य ने कम्बोजों को वार्ताशस्त्रोपजीवी बताया है।

इस समय चार अन्य महाजनपद निम्नलिखित थे जो अतिमहत्वपूर्ण थे :

13. अवन्ति

प. भारत में वर्तमान मालवा इसका केन्द्र बिन्दु था। डॉ. भटनागर के अनुसार इसके दो भाग थे -

1. उत्तरी अवन्ति : इस भाग की राजधानी उज्जियिनी थी।

2. दक्षिणी अवन्ति : इस भाग की राजधानी महिष्मती थी।

पुराणों के अनुसार यहां का शासक ‘ चण्डप्रद्योत ’ था। इसने वत्स नरेश उदयन को बन्दी बनाया तथा इससे अजातशत्रु भी भयभीत रहता था। अंत में प्रद्योत के चौथे वंशज अवन्तिवर्धन को हरा कर शिशुनाग ने अवन्ति का राज्य मगध में मिलाया।

14. वत्स

यहां की राजधानी कोशाम्बी थी। यहां का शासक पाण्डवों का वंशज तथा बुद्ध का समकालीन उदयन था। इसे हाथियों को पालतु बनाने की कला में महारत हासिल थी। जब प्रद्योत ने यह कला सीखने हेतु उदयन को बंदी बनाया तो बाद में उदयन, प्रद्योत की पुत्री स्वप्नवासवदत्ता को लेकर भाग गया तथा विवाह कर लिया। उदयन का विवाह मगध के शासक अजातशत्रु के उत्तराधिकारी ‘‘ दर्शक ’’ की बहन पद्मावती से हुआ था। उपरोक्त विषय का वर्णन भास द्वारा रचित स्वप्नवासवदत्तम्, राजा हर्ष द्वारा रचित प्रियदर्शिका तथा रत्नावलि तथा कालिदास रचित मेघदूतम् से प्राप्त होता है। क्षेमेंद्र द्वारा रचित कथासरित्सागर में उदयन की विजय वर्णित हैं। जबकि प्रियदर्शिका के द्वारा इसे कलिंग विजेता कहा गया है। उदयन के बाद यहां का इतिहास शून्य है।

15. कौशल

वर्तमान फैजाबाद में स्थित इस प्रदेश की राजधानी ‘ श्रावस्ती ’ थी। रामायण कालीन राजधानी अयोध्या थी। इस राज्य को सरयू नदी दो भागों में विभक्त करती है।

1. उत्तरी कोशल - राजधानी श्रावस्ती

2. दक्षिण कोशल - राजधानी कुशावती

घटजातक के अनुसार कोसल नरेश कंस ने काशी को जीत  लिया तथा शाक्यों का कपिलवस्तु, कोशल के अधीन हो गया। यहां पर इक्ष्वाकु वंशज प्रसेनजित का शासन रहा जो शाक्य की दासी पुत्री से विवाह कर विवादास्पद रहा इसी दासी पुत्री (वासवखत्तिया या मल्लिका) से विड्डभ (विरूद्धक) का जन्म हुआ। जिसे प्रसेनजित ने त्याग दिया किन्तु बुद्ध के हस्तक्षेप से उसने मां - बेटे को स्वीकार कर लिया। बड़े होने पर विरूद्धक ने प्रसेनजित को पदच्युत कर सत्ता प्राप्त की तथा शाक्यों को उनके प्रधानमंत्री अम्बरीश की सहायता से तहस नहस कर डाला। अंततः विरूद्धक (क्षुद्रक), उदयन द्वारा मारा गया।

प्रसेनजित के पिता महाकौशल ने अपनी बेटी के विवाह पर बिम्बसार को काशी दहेज में दिया।

16. मगध

भारत का प्रमुख राजनैतिक इतिहास मगध की राजसत्ता पर ही केन्द्रित रहा है। जिसका वर्णन आगे प्राप्त होगा।

प्रमुख गणराज्य

1. कपिलवस्तु के शाक्य - इनकी राजधानी वर्तमान जिला बस्ती के पिपरहवा से 10 मील कपिलवस्तु थी।

 स्त्री को सम्मानीय प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

 शाक्य संघ का प्रशासनिक कार्य संथागार में एक सभा के द्वारा हेता जिसमें गणपूर्ति की उपस्थिति आवश्यक थी।

 विवादित विषय पर मत विभाजन से निर्णय होता था।

 सजातीय विवाह को प्रधानता के दंभ के कारण इनकी प्रसेनजित से शत्रुता थी।

अंततः संथागार के सदस्य तथा कपिलवस्तु के विष्वास प्रधानमंत्री अम्बरीष की सहायता से कपिलवस्तु को विरूद्धक ने जीता।

2. वैशाली के लिच्छिवि - यहां की राजधानी वैषाली (वर्तमान जिला मुजफ्फरपुर का बसाढ़)

 गौतम बुद्ध द्वारा प्रशंसित इस गणराज्य के 7707 राजा थे।

 यहां के लोग सौन्दर्य प्रेमी तपस्वी होते थे।

 कौटिल्य ने इन्हें ‘‘ राजशब्दोपजीवी ’’ कहा है।

 न्याय के आठ अधिकारी नि.लि. थे - 1. विनिश्चय महामात्र 2. व्यावहारिक 3. सूत्रधार 4. अट्ठकुलक 5. भाण्डागारिक 6. सेनापति 7. उपराजा 8. राजा

  दण्ड का आधार ‘‘ पवित्री पोत्थक ’’ नामक संहिता थी।

 अंततः आंतरिक फूट पैदा कर अजातशत्रु द्वारा विजित कर लिया गया।

3. पावा के मल्ल

4. कुशीनारा के मल्ल

5. रामग्राम के कोलिय

6. सुंसमगिरि के भग्ग

7. पिप्लिवन के मोरिय

8. सुपुत के कालाम

9. मिथिला के विदेह

10. कोलांग के ज्ञात्रिक

गणतंत्रों के पतन के कारण :-

सामाजिक दशा -

 कुछ ग्रंथों के अनुसार क्षत्रियों का स्थान ब्राम्हणों से उंचा हो गया था।

 वैश्य समृद्ध तथा बहुसंख्य थे जबकि शूद्र अधिकार विहीन रहे।

 बुद्ध ने ब्राम्हणों के पांच  प्रकार बताए - 1. ब्रम्हसभा 2. देवसम 3.मरियदा 4. सम्मिन मर्याद 5. चाण्डाल सम

 दास प्रथा ऋग्वेद कालीन निरंतर विद्यमान थी।

 प्रजापात्य विवाह ही लोकप्रिय था।

 दहेज प्रथा का प्रचलन था।

 स्त्री दशा में गिरावट दर्ज हुई, गणिकाओं की संख्या में वृद्धि हुई।

 खेमा, सुभद्रा, भद्राकुण्डा तथा केशा जैसी बौद्ध विदुशी सम्मानीय थीं।खेमा की विद्वता से राजा प्रसेनजित भी प्रभावित हुआ तथा उसकी सेवा में उपस्थित भी हुआ।

 अन्य विदुशियां अमरा, उदुम्बरा, सुमा, सुमेधा तथा अनोपमा थीं।

 कोशाम्बी नरेश की पुत्री जयन्ती ने महावीर स्वामी से वाद विवाद किया था।

आर्थिक दशा-

व्यवसाय : इस समय कपड़े का व्यापार काफी समृद्ध था । वत्स जनपद सूती वस्त्र का केंद्र थी। शिवि देश भी सूती वस्त्र उत्पादक था। गांधार उनी कपड़े हेतु प्रसिद्ध था। वाराणसी (काषी)  रेशमी वस्त्र तथा हाथी दांत का प्रमुख केंद्र था।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

 सुत्तनिपात में वैशाली को मगध की राजधानी बताया गया है।

 अनग्र विरोध का अर्थ ‘‘ केवल दिए गए विषय पर ही अपने विचार रखना होता है अन्य विषय पर नहीं ’’

 अनुसावन का अर्थ - ‘‘ प्रस्ताव का पाठन ’’

 शलाका ग्राहपक - मतदान अधिकारी को कहा जाता था।

 जनपद शब्द का प्रथम प्रयोग ब्राम्हण ग्रंथों में मिलता है।

 छठीं सदी ई.पू. के प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय थे -    

1. मुण्डसावक - बौद्ध

2. मागन्धिक -

3. गोतमक - बुद्ध के चचेरे भई देवदत्त के अनुयायी

 राजगृह पांच पहाड़ियों से घिरा नगर था।


धन्यवाद
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